नगर – कोन्स्टेंटिनोस कवाफिस की एक कविता

सरेश सलिल एवं दिमित्रियो वासिलियादिस द्वारा हिंदी में अनुवादित


Είπες· «Θα πάγω σ’ άλλη γη, θα πάγω σ’ άλλη θάλασσα.

तुमने कहा, ‘‘मैं किसी अन्य देश जाऊँगा, किसी अन्य तट पर उतरूँगा ।

Μια πόλις άλλη θα βρεθεί καλλίτερη από αυτή.

खोजूँगा कोई अन्य नगर इससे बढ़ कर।

Κάθε προσπάθεια μου μια καταδίκη είναι γραφτή·

जो कुछ करने का प्रयास मैं करता हूँ नियति है उसकी यहाँ ग़लत साबित होना,

κ’ είν’ η καρδιά μου — σαν νεκρός — θαμμένη.

दबा पड़ा है किसी मुर्दा चीज़ की तरह मेरा दिल।

Ο νους μου ως πότε μες στον μαρασμόν αυτόν θα μένει;

कब तक भला मैं यहाँ अपने दिमाग़ को ग़ारत होता रहने दूँ?

Όπου το μάτι μου γυρίσω, όπου κι αν δω

जिधर सिर घुमाता हूँ, नज़र दौड़ाता हूँ

ερείπια μαύρα της ζωής μου βλέπω εδώ,

जिधर ज़िन्दगी के मनहूस खंडहर ही देखता हूं ।

που τόσα χρόνια πέρασα και ρήμαξα και χάλασα.»

यहाँ, जहाँ इत्ते साल गुज़ारे हैं बाद-बरबाद किया है बिल्कुल अपने को।’’


Καινούριους τόπους δεν θα βρεις, δεν θα βρεις άλλες θάλασσες.

कोई नया देश तुम नहीं खोजोगे, कोई नया तट

Η πόλις θα σε ακολουθεί.

यह नगर हरदम लगा रहेगा तुम्हारे पीछे,

Στους δρόμους θα γυρνάς τους ίδιους.

उन्हीं उन्हीं गली कूचों में चलकर लौट जाओगे ।

Και στες γειτονιές τες ίδιες θα γερνάς·

उन्हीं पड़ोसियों के बीच बूढ़े होगे,

και μες στα ίδια σπίτια αυτά θ’ ασπρίζεις.

उन्हीं घरों के दरमियान बाल तुम्हारे सफ़ेद होंगे।

Πάντα στην πόλι αυτή θα φθάνεις. Για τα αλλού — μη ελπίζεις—

इसी नगर में तुम्हें रहना होगा हरदम । छोड़ दो कहीं और की उम्मीद,

δεν έχει πλοίο για σε, δεν έχει οδό.

कोई पोत नहीं है तुम्हारे लिए, न कोई पथ ।

Έτσι που τη ζωή σου ρήμαξες εδώ

और अगर तुमने ग़ारत की ज़िन्दगी अपनी यहाँ

στην κώχη τούτη την μικρή, σ’ όλην την γη την χάλασες.

इस बन्द कोने में, हर कहीं ग़ारत करते दुनिया में तुम अपनी ज़िन्दगी।


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